शिव के 8 नाम द्वारा शिवलिंग पूजा|Shiv ji ke 8 naam Se Parthiv Shivling ki Puja

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Shiv ji ke 8 naam:महाशिवरात्रि का पावन पर्व पर शिवलिंग का पूजन विधि विधान से किया जाता है वंही श्रावण मास के समय भी शिव जी की पूजा की जाती है ।प्रायः शिवलिंग का पूजन मंदिरो में किया जाता है लेकिन मंदिरो में भीड़ अधिक होने से शिवलिंग का पूजन घर पर ही कर लिया जाता है अगर आपके घर नर्मदेश्वर शिवलिंग या स्फटिक का शिवलिंग हो तब ।लेकिन अगर इस प्रकार के शिवलिंग न हो तब पार्थिव शिवलिंग का निर्माण किया जाता है जिसे मिट्टी से बनाया जाता है ।

हम पार्थिव शिवलिंग पूजन विधियों का पहले पोस्ट में विवरण कर चुके है जिसकी लिंक आपको पोस्ट के अंत में मिल जाएगी ।इस बार हम पार्थिव शिवलिंग की पूजा शिव जी के 8 नामो के द्वारा करेंगे ।यह विधि भी सरल है और उत्तम है ।

Shiv ji ke 8 naam Se Parthiv Shivling ki Puja

शिव के 8 नामो द्वारा शिवलिंग पूजा (Shiv ji ke 8 naam Se Parthiv Shivling ki Puja)

पूजा पार्थिवलिङ्गस्य संप्रोक्ता शिवनामभिः।
तां श्रृणुध्वं मुनिश्रेष्ठाः सर्वकामप्रदायिनीम्।।46।।

हरो महेश्वरः शम्भुः शूलपाणिः पिनाकधृक।
शिवः पशुपतिभ्यश्च महादेव इति क्रमात्।।47।।

मुनिवरो! पार्थिव शिवलिंग पूजन की दूसरी विधि भगवान शिव के नामों से बतायी गयी है। वह पूजा सम्पूर्ण अभीष्टों को देने वाली है। मैं उसे बताता हूँ, सुनो! हर, महेश्वर, शम्भु, शूलपाणि, पिनाकधृक, शिव, पशुपति और महादेव– ये क्रमशः शिव के आठ नाम (Shiv ji ke 8 naam) कहे गये हैं।।46-47।।

shiv 8 names ,शिव के 8 नामो द्वारा शिवलिंग पूजा

मृदाहरणसंघट्टप्रतिष्ठाह्वानमेव च।
स्नपनं पूजनं चैव त्रमस्वेति विसर्जनम्।।48।।

इनमें से प्रथम नाम द्वारा पार्थिव शिवलिंग पूजा मंत्र अर्थात‘ॐ हराय नमः’ का उच्चारण करके पार्थिवलिङ्ग बनाने के लिये मिट्टी ले आये। दूसरे नाम अर्थात ‘ॐ महेश्वराय नमः’ का उच्चारण करके उस पार्थिवलिङ्ग की प्रतिष्ठा करे। तत्पश्चात ‘ॐ शूलपाणये नमः’ कहकर उस पार्थिवलिङ्ग में भगवान् शिव का आवाहन करे। ‘ॐ पिनाकधृषे नमः’ कहकर उस पार्थिवलिङ्ग को नहलाये। ‘ॐ शिवाय नमः’ बोलकर उसकी पूजा करे। फिर ‘ॐ पशुपतये नमः’ कहकर क्षमा प्रार्थना करे और अंत में ‘ॐ महादेवाय नमः:’ कहकर आराध्य देव का विसर्जन कर दे।।48।।

कारादि चतुर्थ्यन्तैर्नमोऽन्तैर्नामभिः क्रमात्।
कर्तव्याश्च क्रियाः सर्वा भक्त्या परमया मुदाः।।49।।

प्रत्येक नाम के आदि में ॐ कार और अंत में चतुर्थी विभक्ति के साथ नमः पद लगाकर बड़े आनन्द और भक्ति भाव से पूजन सम्बन्धी सारे कार्य करने चाहिये।।49।।

कृत्वा न्यासविधिं सम्यक् षडङ्गं करयोस्तथा।
षडक्षरेण मन्त्रेण ततो ध्यानं समाचरेत्।।50।।

षडक्षर मंत्र से अङ्गन्यास और करन्यास की विधि भली भांति सम्पन्न करके फिर नीचे लिखे अनुसार ध्यान करे।।50।।

भक्तैः सनन्दादिभिरर्च्यमानम्।
भक्तार्तिदावानलमप्रमेयं ध्यायेदुमालिङ्गितविश्वभूषणम्।।51।।

ध्यायेन्नित्यं महेशं रजतगिरिनिभं चारुचन्द्रावतंसं रत्नाकल्पोज्ज्वलाङ्गं परशु मृगवराभीतिहस्तं प्रसन्नम्।
पद्मासीनं समन्तात्स्तुतममरगणैर्व्याघ्रकृत्तिं वसानम् विश्वाद्यं विश्वबीजं निखिलभयहरं पञ्चवक्त्रं त्रिनेत्रम्।।52।।

जो कैलास पर्वत पर एक सुन्दर सिंहासन के मध्यभाग में विराजमान हैं, जिनके वामभाग में भगवती उमा उनसे सटकर बैठी हैं। सनक सनंदन आदि भक्तजन जिनकी पूजा कर रहे हैं तथा जो भक्तों के दुःख रुपी दावानल को नष्ट कर देने वाले अप्रमेय शक्तिशाली ईश्वर हैं, उन विश्वभूषण भगवान् शिव का चिंतन करना चाहिये।

भगवान महेश्वर का प्रतिदिन इस प्रकार ध्यान करें। उनकी अङ्गकांति चाँदी के पर्वत की भाँति गौर है। वे अपने मस्तक पर मनोहर चंद्रमा का मुकुट धारण करते हैं। रत्नों के आभूषण धारण करने से उनका श्रीअङ्ग और भी उद्भासित हो उठा है। उनके चार हाथों में क्रमशः परशु, मृगमुद्रा, वर एवं अभय मुद्रा सुशोभित हैं। वे सदा प्रसन्न रहते हैं। कमल के आसन पर बैठे हैं और देवतालोग चारों ओर खड़े होकर उनकी स्तुति कर रहे हैं। उन्होंने वस्त्र की जगह व्याघ्रचर्म धारण कर रखा है। वे इस विश्व के आदि हैं, बीज (कारण) रूप हैं। तथा सबका समस्त भय हर लेने वाले हैं। उनके पांच मुख हैं और प्रत्येक मुखमंडल में तीन तीन नेत्र हैं।।51-52।।

इति ध्यात्वा च सम्पूज्य पार्थिवं लिङ्गमुत्तमम्।
जपेत्पञ्चाक्षरं मन्त्रं गुरुदत्तं यथाविधि।।53।।

इस प्रकार ध्यान तथा उत्तम पार्थिवलिङ्ग का पूजन करके गुरु के दिये हुए पञ्चाक्षर मंत्र का विधिपूर्वक जप करे।।53।।

स्तुतिभिश्चैव देवेशं स्तुवीत प्रणमन्सुधीः।
नानाभिधाभिर्विप्रेन्द्राः पठेद् वै शतरुद्रियम्।।54।।

विप्रवरो! विद्वान पुरुष को चाहिये कि वह देवेश्वर शिव को प्रणाम करके नाना प्रकार की स्तुतियों द्वारा उनका स्तवन करे तथा शतरुद्रिय का पाठ करे।।54।।

ततः साक्षतपुष्पाणि गृहीत्वाञ्जलिना मुदा।
प्रार्थयेच्छङ्करं भक्त्या मन्त्रैरेभिः सुभक्तितः।।55।।

तत्पश्चात अञ्जलि में अक्षत और फूल लेकर उत्तम भक्तिभाव से निम्नांकित मंत्र को पढ़ते हुए प्रेम और प्रसन्नता के साथ भगवान शंकर से इस प्रकार प्रार्थना करे।।55।।

तावकस्त्वद्गुण प्राणस्त्वच्चित्तोऽहं सदा मृड।
कृपानिधे इति ज्ञात्वा भूतनाथ प्रसीद मे।।56।।

सबको सुख देने वाले कृपानिधान भूतनाथ शिव! मैं आपका हूँ। आपके गुण ही मेरे प्राण, मेरे जीवन सर्वश्व हैं। मेरा चित्त सदा आपके ही चिंतन में लगा हुआ है। यह जानकर मुझ पर प्रसन्न होइए।।56।।

अज्ञानाद्यदि वा ज्ञानाज्जपपूजादिकं मया।
कृतघ्न तदस्तु सफलं कृपया तव शंकर।।57।।

कृपा कीजिए। शंकर! मैंने अनजान में अथवा जानबूझकर यदि कभी आपका जप और पूजन आदि किया हो तो आपकी कृपा से वह सफल हो जाय।।57।।

अहं पापी महानद्य पावनश्च भवान्महान्।
इति विज्ञाय गौरीश यदिच्छसि तथा कुरू।।।58।।

गौरीनाथ! में आधुनिक युग का महान पापी हूं, पतित हूँ। और आप सदा से ही परम महान पतित पावन हैं इस बात का विचार करके आप जैसा चाहे वैसा करें।।58।।

वेदै‌: पुराणै: सिद्धान्तैर्ऋषिभिर्विविधैरपि।
न ज्ञातोऽसि महादेव कुतोऽहं त्वां सदाशिव।।59।।

महादेव! सदाशिव! वेदों पुराणों नाना प्रकार के शास्त्रीय सिद्धांतों और विभिन्न महर्षियों ने भी अब तक आप को पूर्ण रूप से नहीं जाना है फिर मैं कैसे जान सकता हूँ।।59।।

यथातथात्वदीयोस्मि सर्वभावैर्महेश्वर।
रक्षणीस्त्वयाहं वै प्रसीद परमेश्वर।।60।।

जैसा हूँ वैसे सब भाव से मैं तुम्हारा हूँ। हे!परमेश्वर आप हम पर प्रसन्न होकर हमारी रक्षा कीजिये।।60।।

इत्येवंचाक्षतान्पुष्पाण्यारोप्य च शिवोपरि।
प्रणमेद्भक्तितश्शंभुसाष्टांग विधिवन्मुने।।61।।

इस प्रकार शिवजी के ऊपर पुष्प और अक्षत का आरोपण करके विधि पूर्वक शिवजी को साष्टांग प्रणाम करे।।61।।

ततः प्रदिक्षणां कुर्याद्यथोक्तविधिनासुधीः।
पुनःस्तुवीतदेवेशंस्तुतिभिः श्रद्धयान्वितः।।62।।

फिर विधिपूर्वक प्रदिक्षणा करे। फिर स्तुतियों से श्रद्धा पूर्वक देवेश की स्तुति करे।।62।।

ततो गलरवं कृत्वा प्रणमेच्छुचिनमध्रीः।
कुर्याद्विज्ञप्तिमादृत्य विसर्जनमथाचरेत्।।63।।

इसके बाद गाल बजाकर(गले से अव्यक्त शब्द का उच्चारण करके) पवित्र एवं विनीत चित्तवाला साधक भगवान को प्रणाम करे। फिर आदरपूर्वक विज्ञप्ति करे और उसके बाद विसर्जन।।63।।

इत्युक्ता मुनिशार्दूलाः पार्थिवार्चा विधानतः।
भुक्तिदा मुक्तिदा चैव शिवभक्तिविवर्धिनी।।64।।

मुनिवरो!इस प्रकार विधिपूर्वक पार्थिवपूजा बतायी गयी। वह भोग और मोक्ष देने वाली तथा भगवान शिव के प्रति भक्तिभाव को बढ़ाने वाली है।।64।।

इत्यध्यायं सुचित्तेन यः पठेच्छृणुयादपि।
सर्वपाप विशुद्धात्मा सर्वान्कामानवाप्नुयात्।।65।।

आयुरारोग्यदं चैव यशस्यं स्वर्ग्यमेव च।
पुत्रपौत्रादिसुखदमाख्यानमिद मुत्तमम्।।66।।

जो इस अध्याय को अच्छे मन से प्रसन्नता पूर्वक पढ़ता है, वह सर्व पापों से विशुद्ध होकर सर्व कामनाओं को प्राप्त हो जाता है। यह उत्तम आख्यान आयु, आरोग्य, यश, और स्वर्ग का देने वाला तथा पुत्र पौत्र का सुख देने वाला है।।65-66।।

इति श्रीशिवमहापुराणे प्रथमायां विद्येश्वर संहितायां साध्यसाधन खण्डे पार्थिव शिवलिङ्ग पूजनविधिवर्णनं नाम विंशोऽध्यायः।।20।।

यह श्री शिव महापुराण की प्रथम विद्याश्वर संहिता का साध्य साधना खंड का बीसवाँ अध्याय है, जिसका शीर्षक पार्थिव शिव लिंग की पूजा करने की विधि का वर्णन है।।20।।

दोस्तों आपने उपरोक्त विधि से जाना की किस प्रकार शिव जी 8 नामो (Shiv ji ke 8 naam) के द्वारा पार्थिव शिवलिंग की पूजा की जाती है और इसका कितना महत्व है ।आप शिवलिंग पूजा की सरल विधि और वैदिक विधि भी हमारे ब्लॉग में देखेंगे ।यह विधि श्री शिव महापुराण में वर्णित है अगर आपके पास शिव महा पुराण है तो आप उसमे भी इस विधि को देख सकते है ।अगर आपको यह जानकारी पसंद आई हो तो इसे अपने शिवभक्त दोस्तों से जरूर शेयर करे ।

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