भारतीय परंपरा में बच्चे का नाम मनमर्ज़ी से नहीं, जन्म नक्षत्र के आधार पर रखा जाता है। जिस नक्षत्र में जन्म हुआ, उसका जो चरण हो, उसके लिए एक निश्चित अक्षर होता है। यह अक्षर नाम का पहला अक्षर बनता है। इस लेख में पूरी तालिका दी गई है, ताकि आप स्वयं देख सकें।
नामाक्षर कैसे तय होता है
प्रत्येक नक्षत्र 13 अंश 20 कला का होता है और इसे चार बराबर चरणों या पदों में बाँटा जाता है। प्रत्येक चरण 3 अंश 20 कला का होता है, और प्रत्येक चरण के लिए एक अक्षर निर्धारित है। कुल 27 नक्षत्र और 108 चरण, इसलिए 108 नामाक्षर।
इसके लिए आपको दो जानकारियाँ चाहिए: बच्चे का जन्म नक्षत्र और वह किस चरण में जन्मा है। दोनों सटीक जन्म तिथि, समय और स्थान से पंचांग द्वारा निकाले जाते हैं। चरण जानना आवश्यक है, क्योंकि एक ही नक्षत्र के चार अक्षर अलग-अलग होते हैं।
सभी 27 नक्षत्रों के नामाक्षर
| नक्षत्र | चरण 1 | चरण 2 | चरण 3 | चरण 4 |
|---|---|---|---|---|
| अश्विनी | चू | चे | चो | ला |
| भरणी | ली | लू | ले | लो |
| कृत्तिका | अ | ई | उ | ए |
| रोहिणी | ओ | वा | वी | वू |
| मृगशिरा | वे | वो | का | की |
| आर्द्रा | कू | घ | ङ | छ |
| पुनर्वसु | के | को | हा | ही |
| पुष्य | हू | हे | हो | डा |
| अश्लेषा | डी | डू | डे | डो |
| मघा | मा | मी | मू | मे |
| पूर्व फाल्गुनी | मो | टा | टी | टू |
| उत्तर फाल्गुनी | टे | टो | पा | पी |
| हस्त | पू | ष | ण | ठ |
| चित्रा | पे | पो | रा | री |
| स्वाति | रू | रे | रो | ता |
| विशाखा | ती | तू | ते | तो |
| अनुराधा | ना | नी | नू | ने |
| ज्येष्ठा | नो | या | यी | यू |
| मूल | ये | यो | भा | भी |
| पूर्वाषाढ़ा | भू | धा | फा | ढा |
| उत्तराषाढ़ा | भे | भो | जा | जी |
| श्रवण | खी | खू | खे | खो |
| धनिष्ठा | गा | गी | गू | गे |
| शतभिषा | गो | सा | सी | सू |
| पूर्व भाद्रपद | से | सो | दा | दी |
| उत्तर भाद्रपद | दू | थ | झ | ञ |
| रेवती | दे | दो | चा | ची |
यह तालिका पारंपरिक पंचांग के अनुसार दी गई है। क्षेत्र और परंपरा के अनुसार कुछ अक्षरों में मामूली अंतर मिल सकता है, इसलिए अंतिम निर्णय अपने कुलपुरोहित या पंडित से पुष्टि करके लें।
नामकरण संस्कार कब किया जाता है
परंपरा में नामकरण संस्कार जन्म के ग्यारहवें या बारहवें दिन किया जाता है। कुछ परिवारों में यह इक्कीसवें दिन या पहले महीने की समाप्ति पर होता है। शुभ मुहूर्त, नक्षत्र और वार देखकर तिथि तय की जाती है, और रिक्ता तिथियों तथा भद्रा काल से बचा जाता है।
दो नामों की परंपरा
कई परिवारों में दो नाम रखे जाते हैं। एक राशि नाम, जो नामाक्षर के अनुसार होता है और धार्मिक कार्यों, विवाह के समय तथा पूजा में प्रयोग होता है। दूसरा व्यवहारिक नाम, जो घर और स्कूल में पुकारा जाता है। यदि आप नामाक्षर के अक्षर से कोई नाम पसंद नहीं कर पा रहे हैं, तो यह परंपरा आपको दोनों सुविधाएँ देती है।
नाम चुनते समय ध्यान रखने योग्य बातें
- पहले जन्म नक्षत्र और चरण की पुष्टि करें। चरण के बिना अक्षर तय नहीं हो सकता।
- तालिका से अपने चरण का अक्षर देखें, फिर उस अक्षर से आरंभ होने वाले नामों की सूची बनाएँ।
- नाम का अर्थ अवश्य जाँचें। परंपरा में शुभ अर्थ वाले नाम को महत्व दिया जाता है।
- उच्चारण की सरलता देखें। बच्चे को यह नाम जीवन भर बोलना और सुनना है।
- पूरा नाम बोलकर देखें, प्रथम नाम और कुलनाम एक साथ। कागज़ पर अच्छा लगने वाला नाम बोलने में कठिन हो सकता है।
यदि नक्षत्र का अक्षर पसंद न आए
यह प्रश्न बहुत आता है। परंपरा में नामाक्षर का महत्व है, परंतु किसी शास्त्र में यह नहीं लिखा कि दूसरे अक्षर का नाम रखने से हानि होगी। व्यवहारिक समाधान वही दो नाम वाली परंपरा है: राशि नाम नामाक्षर के अनुसार, और पुकारने का नाम आपकी पसंद से। इससे परंपरा भी निभती है और परिवार की इच्छा भी पूरी होती है।