परिवार में विवाह तय होने के बाद पहला काम तिथि निकालना होता है। पंडित जी पंचांग खोलकर बैठते हैं और कुछ देर बाद दो या तीन तिथियाँ बता देते हैं। वे किन बातों की जाँच कर रहे थे, यह जान लेने पर आप उनसे बेहतर बातचीत कर सकते हैं और अपनी सुविधा की बात भी रख सकते हैं।
पंचांग के पाँच अंग
पंचांग शब्द का अर्थ ही पाँच अंग है। मुहूर्त इन्हीं पाँच के मेल से तय होता है।
| अंग | क्या है | विवाह में भूमिका |
|---|---|---|
| तिथि | चंद्र मास का दिन | रिक्ता तिथियाँ, अर्थात् चतुर्थी, नवमी और चतुर्दशी, सामान्यतः छोड़ी जाती हैं |
| वार | सप्ताह का दिन | सोमवार, बुधवार, गुरुवार और शुक्रवार अनुकूल माने जाते हैं |
| नक्षत्र | चंद्रमा का नक्षत्र | विवाह के लिए कुछ नक्षत्र विशेष रूप से शुभ माने गए हैं |
| योग | सूर्य और चंद्र की स्थिति से बना योग | व्याघात, परिघ और वज्र जैसे योग टाले जाते हैं |
| करण | तिथि का आधा भाग | विष्टि करण, यानी भद्रा, से बचा जाता है |
विवाह के लिए शुभ नक्षत्र
परंपरा में विवाह के लिए ये नक्षत्र विशेष रूप से अनुकूल बताए गए हैं: रोहिणी, मृगशिरा, मघा, उत्तर फाल्गुनी, हस्त, स्वाति, अनुराधा, मूल, उत्तराषाढ़ा, उत्तर भाद्रपद और रेवती। इनमें रोहिणी, हस्त और उत्तराषाढ़ा को सर्वाधिक शुभ माना जाता है।
ध्यान दें कि नक्षत्र दिन के किसी विशेष समय तक ही रहता है, पूरे दिन नहीं। इसीलिए मुहूर्त में केवल तिथि नहीं, समय भी बताया जाता है।
जिन कालों से बचा जाता है
- भद्रा काल, जिसे विष्टि करण भी कहते हैं। शुभ कार्यों के लिए यह सर्वाधिक वर्जित समय माना गया है।
- राहु काल, जो प्रत्येक दिन डेढ़ घंटे का होता है और वार के अनुसार बदलता है।
- गुरु और शुक्र का अस्त होना। ये दो ग्रह विवाह के मुख्य कारक हैं, और जब ये सूर्य के निकट आकर अस्त हो जाते हैं, उस अवधि में विवाह नहीं किया जाता।
- चातुर्मास, यानी आषाढ़ से कार्तिक तक की अवधि, जिसमें परंपरागत रूप से विवाह नहीं होते।
- मलमास या अधिक मास, तथा खरमास, जब सूर्य धनु या मीन राशि में होता है।
- ग्रहण की अवधि और उससे लगे दिन।
यही कारण है कि किसी वर्ष में विवाह मुहूर्त कुछ महीनों में बहुत कम मिलते हैं और कुछ महीनों में अधिक। यदि आपको बताया गया है कि अगले तीन महीने में कोई तिथि नहीं है, तो सामान्यतः इसका कारण गुरु या शुक्र का अस्त होना, अथवा खरमास होता है।
वर और वधू की कुंडली भी देखी जाती है
सामान्य पंचांग शुद्धि के साथ यह भी देखा जाता है कि चुनी गई तिथि वर और वधू दोनों की कुंडली के अनुकूल है या नहीं। मुख्यतः यह जाँचा जाता है कि उस समय गोचर में गुरु और शनि की स्थिति दोनों के लिए प्रतिकूल न हो, और चंद्रमा की स्थिति अनुकूल हो।
इसीलिए एक ही दिन दो अलग परिवारों के लिए अलग-अलग निष्कर्ष दे सकता है। पंचांग में शुभ तिथि सबके लिए एक है, परंतु कुंडली की अनुकूलता व्यक्तिगत होती है।
व्यवहारिक रूप से क्या करें
- दोनों पक्षों की जन्म तिथि, समय और स्थान इकट्ठा करके पंडित जी को दें।
- अपनी सुविधा की अवधि बताएँ, जैसे कोई विशेष महीना या छुट्टियों का समय। पंडित जी उसी दायरे में विकल्प खोज सकते हैं।
- दो या तीन तिथियाँ माँगें, एक नहीं। इससे स्थल और अतिथियों की व्यवस्था में लचीलापन रहता है।
- प्रत्येक तिथि के साथ शुभ समय की अवधि अवश्य पूछें, क्योंकि लग्न का समय सीमित होता है।
- तिथि तय होने के बाद उसे लिखित रूप में ले लें, जिसमें तिथि, नक्षत्र और लग्न का समय स्पष्ट हो।
यदि परिवार की सुविधा और मुहूर्त में टकराव हो रहा है, तो अपने पंडित जी से खुलकर बात करें। परंपरा में मुहूर्त के कई स्तर हैं, और अक्सर कोई मध्यम मार्ग निकल आता है। इस विषय पर बातचीत की गुंजाइश हमेशा रहती है।
कुंडली मिलान अलग विषय है
मुहूर्त और कुंडली मिलान दो अलग चरण हैं। मिलान विवाह से पहले किया जाता है और यह देखता है कि जोड़ी अनुकूल है या नहीं। मुहूर्त उसके बाद आता है और यह तय करता है कि विवाह कब हो। दोनों को एक मान लेने से भ्रम होता है। यदि आपने अभी मिलान नहीं कराया है, तो हमारे मुफ़्त 36 गुण कैलकुलेटर से आप प्रारंभिक जानकारी ले सकते हैं।