रत्न ज्योतिष का वह हिस्सा है जहाँ सबसे ज़्यादा पैसा ख़र्च होता है और सबसे कम सवाल पूछे जाते हैं। कोई कह देता है कि आपको नीलम पहनना चाहिए, और अगले दिन आप दुकान पर होते हैं। यह लेख उन पाँच जाँचों के बारे में है जो ख़रीदने से पहले होनी चाहिए।
पहले यह समझें कि रत्न क्या करता है
रत्न ग्रह की ऊर्जा को बढ़ाता है, बदलता नहीं। यह एक अकेला वाक्य पूरे विषय की कुंजी है। यदि वह ग्रह आपकी कुंडली में शुभ भाव का स्वामी है, तो उसकी ऊर्जा बढ़ने से लाभ होगा। और यदि वही ग्रह छठे, आठवें या बारहवें भाव का स्वामी है, तो उसकी ऊर्जा बढ़ाने का अर्थ है उस भाव का प्रभाव भी बढ़ाना।
इसीलिए एक ही रत्न दो लोगों को अलग परिणाम देता है, और इसीलिए बिना कुंडली देखे दी गई रत्न की सलाह जोखिम भरी है।
नौ ग्रह और उनके रत्न
| ग्रह | रत्न | उपरत्न | उंगली | वार |
|---|---|---|---|---|
| सूर्य | माणिक | गारनेट, लाल स्पिनल | अनामिका | रविवार |
| चंद्र | मोती | मूनस्टोन | कनिष्ठा | सोमवार |
| मंगल | मूंगा | कार्नेलियन | अनामिका | मंगलवार |
| बुध | पन्ना | पेरिडॉट, ग्रीन ओनिक्स | कनिष्ठा | बुधवार |
| गुरु | पुखराज | सुनहला, टोपाज़ | तर्जनी | गुरुवार |
| शुक्र | हीरा | सफ़ेद पुखराज, ज़िरकॉन | मध्यमा | शुक्रवार |
| शनि | नीलम | कटैला, लाजवर्त | मध्यमा | शनिवार |
| राहु | गोमेद | सुनहला | मध्यमा | शनिवार |
| केतु | लहसुनिया | लहसुनिया क्वार्ट्ज़ | मध्यमा | मंगलवार |
जाँच एक: ग्रह किस भाव का स्वामी है
यह सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न है और सबसे कम पूछा जाता है। अपने ज्योतिषी से सीधे पूछें: यह ग्रह मेरी कुंडली में किन भावों का स्वामी है, और वह किस भाव में बैठा है। यदि उत्तर में छठा, आठवाँ या बारहवाँ भाव आता है, तो रुक जाइए और दूसरी राय लीजिए।
जाँच दो: कमज़ोर और अशुभ में अंतर
कमज़ोर ग्रह को बल देना उपयोगी है। अशुभ ग्रह को बल देना नुक़सानदेह है। ये दो अलग स्थितियाँ हैं और इन्हें मिला देना सबसे आम भूल है। कमज़ोर ग्रह का अर्थ है वह शुभ है परंतु उसे सहारा चाहिए। अशुभ ग्रह का अर्थ है उसका काम ही कठिनाई देना है, और उसे मज़बूत करना अपने ही विरुद्ध जाना है।
जाँच तीन: वज़न और धातु
परंपरा में रत्न का वज़न जातक के शरीर-भार और कुंडली के अनुसार तय किया जाता है। सामान्य सीमाएँ इस प्रकार बताई जाती हैं: माणिक 3 से 6 रत्ती, मोती 4 से 8, मूंगा 5 से 9, पन्ना 3 से 6, पुखराज 4 से 7, नीलम 3 से 5, गोमेद 5 से 8, लहसुनिया 5 से 8, और हीरा आधे से डेढ़ कैरेट।
धातु भी ग्रह के अनुसार होती है। पुखराज और माणिक सोने में, मोती और नीलम चांदी या पंचधातु में, मूंगा तांबे या सोने में। रत्न त्वचा से स्पर्श करता रहे, यह आवश्यक माना जाता है, इसलिए अंगूठी की तली खुली रखवाएँ।
जाँच चार: प्रमाणपत्र और गुणवत्ता
- किसी मान्यता प्राप्त प्रयोगशाला का प्रमाणपत्र माँगें, जिसमें रत्न का नाम, वज़न, मूल और उपचार की जानकारी हो।
- यह अवश्य पूछें कि रत्न प्राकृतिक है या प्रयोगशाला में बनाया गया। दोनों की क़ीमत में बहुत अंतर है।
- दरार, दूधियापन और आंतरिक दाग जाँचें। ज्योतिषीय दृष्टि से दोषयुक्त रत्न धारण न करने की सलाह दी जाती है।
- पक्का बिल लें और वापसी की शर्तें लिखित में लें।
- अत्यधिक छूट पर सावधान रहें। असली रत्न सस्ता नहीं होता।
जाँच पाँच: परीक्षण अवधि
नीलम, गोमेद और लहसुनिया के लिए यह विशेष रूप से बताया गया है। इन्हें स्थायी रूप से धारण करने से पहले कुछ दिन परीक्षण के रूप में पहना जाता है। यदि इस अवधि में नींद बिगड़े, मन अशांत रहे या स्वास्थ्य में गिरावट दिखे, तो रत्न उतार दिया जाता है। परंपरा में इसे स्पष्ट संकेत माना गया है।
रत्न औषधि नहीं हैं। किसी भी चिकित्सकीय उपचार को रत्न से बदलने का प्रयास न करें। यदि आप बीमार हैं, तो पहले चिकित्सक के पास जाएँ। कोई ज्योतिषी यदि दवा छोड़ने की सलाह दे, तो वह सलाह मानने योग्य नहीं है।
उपरत्न कब चुनें
उपरत्न वही ग्रह-ऊर्जा देता है, परंतु प्रभाव धीमा माना जाता है, इसलिए इसका वज़न मुख्य रत्न से अधिक रखा जाता है। बजट सीमित हो तो प्रमाणित उपरत्न, अप्रमाणित मुख्य रत्न से बेहतर विकल्प है। यह सामान्य समझ की बात है और परंपरा इसे स्वीकार करती है।
रत्न धारण की विधि
- ग्रह के वार को, प्रातःकाल शुभ मुहूर्त में धारण करें।
- अंगूठी को कच्चे दूध और स्वच्छ जल से शुद्ध करें।
- संबंधित ग्रह के मंत्र का 108 बार जाप करें।
- निर्धारित उंगली में धारण करें और यह देखें कि रत्न त्वचा से स्पर्श कर रहा है।
- पहले महीने में अपने अनुभव पर ध्यान दें, विशेषकर नींद और मन की स्थिति पर।