षष्ठ भाव — शत्रु भाव

षष्ठ भाव (शत्रु भाव) शत्रु, रोग, ऋण, सेवा का कारक भाव है।

मुख्य तथ्य

#6
संस्कृत नामशत्रु भाव
कारकशत्रु, रोग, ऋण, सेवा

इस भाव में ग्रहों का फल

ग्रहसामान्य प्रभाव
सूर्यसूर्य इस भाव में हो तो शत्रु, रोग, ऋण, सेवा से जुड़े विषयों में आत्मा, पिता, सत्ता, जीवन-शक्ति का रंग जुड़ जाता है।
चंद्रचंद्र इस भाव में हो तो शत्रु, रोग, ऋण, सेवा से जुड़े विषयों में मन, माता, भावनाएँ, स्मृति का रंग जुड़ जाता है।
मंगलमंगल इस भाव में हो तो शत्रु, रोग, ऋण, सेवा से जुड़े विषयों में साहस, भाई-बहन, भूमि, शल्य का रंग जुड़ जाता है।
बुधबुध इस भाव में हो तो शत्रु, रोग, ऋण, सेवा से जुड़े विषयों में बुद्धि, वाणी, व्यापार, शिक्षा का रंग जुड़ जाता है।
गुरुगुरु इस भाव में हो तो शत्रु, रोग, ऋण, सेवा से जुड़े विषयों में ज्ञान, धन, संतान, धर्म का रंग जुड़ जाता है।
शुक्रशुक्र इस भाव में हो तो शत्रु, रोग, ऋण, सेवा से जुड़े विषयों में प्रेम, विवाह, सौंदर्य, सुख का रंग जुड़ जाता है।
शनिशनि इस भाव में हो तो शत्रु, रोग, ऋण, सेवा से जुड़े विषयों में अनुशासन, कर्म, विलंब, आयु का रंग जुड़ जाता है।
राहुराहु इस भाव में हो तो शत्रु, रोग, ऋण, सेवा से जुड़े विषयों में महत्वाकांक्षा, विदेश, तकनीक का रंग जुड़ जाता है।
केतुकेतु इस भाव में हो तो शत्रु, रोग, ऋण, सेवा से जुड़े विषयों में वैराग्य, मोक्ष, पूर्वजन्म-कौशल का रंग जुड़ जाता है।

सुझाए गए उपाय

षष्ठ भाव को बल देने के लिए इस भाव के स्वामी ग्रह की स्थिति देखकर उपाय किए जाते हैं। सामान्य रूप से इस भाव से जुड़े दान, सेवा और अनुशासन इसे सुदृढ़ करते हैं।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

षष्ठ भाव किसका कारक है?

षष्ठ भाव शत्रु, रोग, ऋण, सेवा का कारक भाव है और संस्कृत में इसे शत्रु भाव कहा जाता है।

षष्ठ भाव कमज़ोर होने पर क्या होता है?

भाव कमज़ोर होने पर उससे जुड़े क्षेत्र में विलंब या असंतोष दिखता है। निष्कर्ष से पहले भाव के स्वामी और दशा की स्थिति देखना आवश्यक है।